हल्द्वानी।
अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, हल्द्वानी मीनाक्षी शर्मा के न्यायालय ने मु0 25,27,541/- के चेक बाउंस के आरोपी को दोषमुक्त कर दिया।
परिवादी मैसर्स हिन्दुजा लेलैण्ड फाईनेन्स लिमिटेड की ओर से अभियुक्त कफील अहमद के विरुद्ध धारा-138 परक्राम्य लिखत अधिनियम के अन्तर्गत परिवाद प्रस्तुत किया गया जिसमें कथन किया गया कि विपक्षी द्वारा परिवादी कम्पनी से वाहन ट्रक पंजीकरण संख्या यूपी 25 सीटी 3924 को क्रय करने करने हेतु 28,00,000/- रूपये का ऋण एग्रीमेण्ट किया गया तथा 53 माह की किश्तो पर लिया गया परंतु किश्तों की अदायगी समय से नहीं की गई तथा विपक्षी द्वारा अपना उक्त वाहन कम्पनी में सरेण्डर कर दिया गया तथा उक्त वाहन को विक्रय कर बकाया धनराशि स्वयं अदा करने हेतु कहा गया जिस पर परिवादी कम्पनी द्वारा उक्त सरेण्डर वाहन को विक्रय कर दिया गया तथा शेष धनराशि की अदायगी हेतु विपक्षी द्वारा परिवादी को अपने खाते वाले बैंक, पंजाब नेशनल बैंक शाखा किच्छा का एक चैक चैक मु०25,27,541/- रूपये स्वहस्ताक्षरित कर इस आश्वासन के साथ दिया था कि उक्त चैक बैंक में प्रस्तुत करने पर परिवादी को वर्णित धनराशि का भुगतान प्राप्त हो जायेगा। परिवादी द्वारा उक्त चैक को भुगतान हेतु अपने खातें वाले बैंक, भारतीय स्टेट बैंक शाखा हल्द्वानी जिला नैनीताल में प्रस्तुत करने पर उक्त चैक बैंक द्वारा “फंड्स इंसफिशिएंट” की टिप्पणी के साथ अनादरित कर दिया गया। चैक अनादरण के पश्चात परिवादी द्वारा अपने अधिवक्ता प्रकाश जोशी के माध्यम से एक कानूनी नोटिस अभियुक्त को प्रेषित कराया जो अभियुक्त को तामिल हुआ परन्तु आज दिन तक अभियुक्त ने उक्त धनराशि वापस नहीं की है।
परिवाद दर्ज होने के उपरान्त परिवादी द्वारा धारा 200 दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 के अन्तर्गत अपना बयान शपथपत्र के माध्यम से प्रस्तुत किया गया और धारा 202 दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 के अन्तर्गत दस्तावेजी साक्ष्य पेश किये गये।
अभियुक्त की तरफ से एडवोकेट प्रदीप लोहनी ने पेरवी की।
अभियुक्त ने कथन किया है कि जिस समय गाड़ी खरीदने का एग्रीमेंट हुआ था उस समय मैनें 06 ब्लैंक चैक दिये थे वाहन मेरे नाम से खरीदा गया था लेकिन वाहन मेरे साले बब्बू उर्फ अनीश ने लिया था” तथा बाद में परिवादी कंपनी द्वारा बिना अभियुक्त की अनुमति के उक्त वाहन को बेच दिया गया।
अभियुक्त के अधिवक्ता प्रदीप लोहनी ने तर्क दिया कि परिवादी फर्म द्वारा उनकी ओर से प्रस्तुत दस्तावेजों को समुचित रूप से न्यायालय में सिद्ध नहीं कराया गया है तथा परिवादी द्वारा अभियुक्त के साथ हुए अनुबंध भी न्यायालय में सिद्ध नहीं किया गया है। अभियुक्त की बकाया ऋण की राशि के संबंध में भी परिवादी द्वारा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है। साक्ष्य के अभाव में परिवादी का कथानक सिद्ध नहीं होता है।
दोनों पक्षो के तर्कों को सुनने के बाद माननीय न्यायालय द्वारा अभियुक्त को दोषमुक्त करने का निर्णय देते हुए अभियुक्त कफील अहमद को मु0 25,27,541/- की अदायगी के दायित्व से मुक्त कर दिया।





